Tuesday, 3 October 2017

वेदांचे अपौरुषेयत्व, आद्य शंकराचार्य नि वेदांमध्ये इतिहास - खंडन नि मंडन


वेदांचे अपौरुषेयत्व समजून देण्यासाठी लिहिलेला लेख !

क्या परमहंस आदि श्रीशङकराचार्य वेदोंमे इतिहास मानते है???

आचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयते अधि !
स्वयं ह्यपि आचरेत् य: तु आचार्य: इति स्मृत: !
वेद अपौरुषेय है यह सर्वानुमतसे वैदिकोंमे सिद्ध है |यहाँ हमने वैदिक शब्दका प्रयोग किया है, साम्प्रत कालके पाश्चात्योंका अन्धानुकरण करनेहारे मूढ विद्वानोंका, पुरातत्ववेत्ताओंका, इतिहासकारोंका नहीं | अस्तु | अत: वेदोंकी अपौरुषेयता पर उठाने जानेहारे आक्षेपोंका खण्डन | हारे शब्दका प्रयोग महर्षि दयानन्दने सर्वप्रथम किया था क्योंकि विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के आग्रहको लेकर | वाले शब्द शुद्ध हिन्दी नही है अत: |

वेदोंकी अपौरुषेयता प्रथम लक्षण तो यह है की उस ग्रन्थ में इतिहास नही चाहिये, क्यौंकि इतिहास तो तब लिखा जाता है जब घटना घटी हो | अत: वेद सृष्ट्यारम्भ से पूर्व होने से, जिसका प्रमाण नासदीय सुक्तसेभी प्राप्त होता है एवं पुरुषसूक्तसेभी एवं और भी मन्त्रोंसे, वे इतिहासग्रन्थ नही हो सकते | दुर्भाग्यसे इस सिद्धांत को न समझनेहारे कुछ लोग वेदोंमें इतिहास सिद्ध करने का व्यर्थ प्रयत्न करते है और उस हेतु आचार्य शङकर के साहित्य का आधार लेके अपना हेतु स्थापित करने का प्रयत्न करते है | इससे वैदिक सिद्धान्त की तो हानी होती ही है अपितु आचार्य के प्रति भी भ्रम प्रसृत होता है | अत: इस भ्रम को दूर करना हमारा कर्तव्य है इस हेतु आचार्य की भूमिका को स्पष्ट करनेहारा यह लेख पाठकोंके सामने प्रस्तुत है |

आक्षेप क्रमांक प्रथम - आचार्य आदि शंकर अपने बृहदारण्यक भाष्य मे कहते है:
"इतिहास इत्युर्वशीपुरुरवसो: संवादादिरुर्वशीहाप्सरा इत्यादि ब्राम्हणेव। पुराणमसद्वाइदमग्र आसिदित्यादि।।"
भावार्थ: उर्वशीनामक अप्सरा व राजा पुरुरवा इनके संवादरूप जो ब्राम्हण ग्रंथोमे वर्णन आया है, वो ब्राम्हणहि इतिहास है। और "यह सर्व जगत सृष्टीपूर्व असदरूप था" इत्यादि प्रकार के जो श्रुतीवाक्य है वहि पुराण है, ऐसा समझना चाहिये।
आचार्य आदि शंकर ने यहा इतिहास व पुराण को बिलकुल स्पष्ट कर दिया है।

समाधान - बलिहारी है आपकी भाई | आपने न तो आचार्य के इन वाक्योंका का ठीकसे अर्थ किया है और तो और नाही उसका संदर्भ ठीकसे दिया | यह द्वितीय बार हुआ है की आपने ठीकसे सन्दर्भभी नहीं दिया बृहदारण्यकोपनिषदका | ठीक है अब हम ही दे देते है |यह वाक्य बृहदारण्यक २.४.१० इस स्थानका है |
स यथार्द्रैंधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निश्वसितानि ॥
इस पर भाष्य करते हुए आचार्य शङकर कहते है
इतिहास इत्युर्वशीपुरुरवसो: संवादादिरुर्वशीहाप्सरा इत्यादि ब्राम्हणेव। पुराणमसद्वाइदमग्र आसिदित्यादि।।
यहाँ आचार्य स्वयं कहते है की उर्वशी एवं पुरुरवा का संवाद ब्राह्मणग्रन्थ में इतिहास रुपसे है | कौनसा ब्राह्मण? तो वह है शतपथ ब्राह्मण जिसका स्थान ११.५.१ यहाँपर है | इसमें उर्वशी एवं पुरुरवा का पूर्ण संवाद है |यदि आपको देखने की इच्छा है तो वहाँ शोध ले सकते है |हाँ चुँकि आप लोग ब्राह्मण ग्रन्थ को भी वेद माननेके पक्षधर है जो पूर्णत: तर्कहीन एवं असत्य है | जिसका उत्तर हमनें निम्नलिखित गोपथब्राह्मणके सन्दर्भ से दिया है |आप तो इतने हठी है की आचार्य के अर्थ को यथार्थ न समझपर आचार्यपर ही आरोप कर बैठे है | अरे भाई आचार्य के उपरोक्त वचन आचार्य वेदोमें अर्थात् मन्त्रभागमें इतिहास नही मानते, वे ब्राह्मणग्रन्थमें उर्वशीपुरुरवा का इतिहास मानते है और वह सत्यभी है | क्योंकि ब्राह्मणग्रन्थ तो ऋषिकृत होनेसे उनमें अनित्य व्यक्तियोंका इतिहास तो सिद्ध है ही | यह हम कभीभी नकारते नही वरन् हमारें सिद्धांत को यह पुष्टी भी देता है | क्योंकि वेद अर्थात मन्त्रभाग को छोडकें सर्व ग्रन्थ पौरुषेय अर्थात मनुष्य या ऋषिकृत है |तो उनमें इतिहास तो होगाही | किन्तु मन्त्रभाग अर्थात वेदोमें इतिहास नही सिद्ध हो सकता |
अब हम आपको आचार्यकेही स्थानपर आसीन एक शंकराचार्य का संवाद देते है जिससे आद्य शंकराचार्य स्वयं वेदोमें इतिहास नही मानते यह सिद्ध होता है |
उनका नाम है जगद्गुरु श्री अभिनव विद्यातीर्थ स्वामीगल, जो शृंगेरी पीठ के ३५ वें आचार्य है |
A series of dialogues where Jagadguru Sri Abhinava Vidyatirtha Swamigal, the 35th Acharya of the Sringeri Sharada Peetham, gives clarifications on a variety of topics concerning Sanatana Dharma. The book is a Publication of Sri Vidyatirtha Foundation, Chennai. (Rs.50)] is reproduced from the Chapter ‘Veda-s’:
//Disciple: We find many stories in the Veda-s. Are they accounts of historical events?
Acharyal: No. The stories do not relate to actual worldly incidents. The Veda-s, which are like the breath of the Supreme Being, have no beginning. As such, they are not the records of the historical events of any age. The Brihadaranyaka Upanishad for instance, contains a discussion between sage Yajnavalkya and king Janaka. This is not the retelling of a dialogue between two individuals who lived in some specific period. An event similar to that narrated could have occurred at some time but it cannot be said that this is what has been cited in the Upanishad. The stories in the Veda-s are meant only as an illustration.
बस इससेही स्पष्ट है की आचार्य स्वयं वेदोमें इतिहास नही मानते और स्वयं उनकेही पीठ पर आसीन एक आचार्य यह कथन कर रहा है | बस इससे और प्रमाणोंकी क्या आवश्यकता है???
पूर्वमेंही हम कह चुके है वेदोमें किसी भी अनित्य व्यक्ती का या वस्तुका या कथाओंका इतिहास नही है, जो भी है वह पश्चातके सर्व ग्रन्थोमें है जेसे ब्राह्मण, उपनिषद, पुराण आदि | वेद नित्य होनेके कारण एवं वे सृष्ट्यारंभ में ही प्रकट होने के कारण उनमें किसी लौकिक व्यक्तीका इतिहास होना केवल असंभवही नहीं वरन् मूर्खता ही है | हाँ जो कुछ भी इतिहास है वह सृष्टीरचना का ही है और वह होना भी चाहिये क्यौंकि सृष्टीरचना जहाँ भी होगी वह उस परमात्मा एवं उसकी प्रकृति सेही उन निश्चित नियमोंसे होगी जो वेद में है | सृष्टिरचना कहींभी एवं कितनी भी बार होगी वह एकही नियमसें होगी इसका प्रमाण आचार्य शङकर ने स्वयं ब्रह्मसूत्रभाष्यमें दिया है


इत्यतो धर्माधर्मफलभूतोत्तरा सृष्टिर्निष्पद्यमाना पूर्वसृष्टिसदृश्येव निष्पद्यते |
अर्थ - इसलिए धर्म एवं अधर्मकी फलभूत जो उत्तरोत्तर सृष्टि उत्पन्न होती जाती है, वह पूर्व सृष्टि केही समान है |
(संदर्भ - पृष्ठ ७०४, अध्याय १, पा ३, शाङकरभाष्य रत्नप्रभा भाषानुवादित सहित, विक्रम संवत १९९३)

यह आचार्यकाही शारीरिक भाष्य है एवं इसपर जो रत्नप्रभा नामक भाष्य है और गोपीनाथ कविराज नेही इसका अनुवाद हिंदी में किया है | मेरे समीप यह है | यदि आपको इच्छा है तो प्रेषित करदुँगा |
सो इस सूत्रकें प्रमाण सेभी हम सिद्ध करते है वेदोंमें जो सृष्टिरचना का इतिहास है केवल वही है, अन्य नही | अन्य जो कुछ भी वर्णन या कथाएँ पायी जाती है वे सर्व अलङकारिक वर्णन है एवं उनके अर्थ भी योगिक एवं योगारुढ है, लौकिक नहीं | इसका प्रमाण स्वयं निरुक्तकार यास्क तो देते ही है देखियें
ऋग्वेद के १.३२.१० इस मन्त्र पर भाष्य करते हुए जहाँ वृत्र शब्द आया है निरुक्तकार कहता है
तत्को वृत्रो मेघेति नैरुक्ता:, त्वाष्ट्रोsसुर इत्यैतिहासिका: | अपां च ज्योतिपश्च मिश्रीभावकर्मणो वर्षकर्म जायते तत्रोपमार्थेन युद्धवर्णां भवन्ति, अहिवत्तु खलु मन्त्रवर्णां ब्राह्मणवादाश्च |
निरुक्त - २.१६
अर्थ - वृत्र कौन है? मेघ है यह नैरुक्त कहते है, त्वष्टा का पुत्र असूर है यह ऐतिहासिक कहते है | यदि हम वृत्र को मेघ माने तो मन्त्रोंमे जो इन्द्र वृत्र संग्राम का अर्थ क्या होगा? उत्तर है - पानी और ज्योति के मिलने से वर्षा की क्रिया उत्पन्न होती है, जिस पर उपमा के प्रयोजन से युद्ध का वर्णन है | वास्तव युद्ध नही अपितु रुपक अलङकारिक वर्णन है |यहाँ निरुक्तकार स्पष्टरुपसे "उपमार्थेन युद्धवर्णां भवन्ति" ऐसा शब्दप्रयोग करते है भाई, तनिक इसको तो देखो |
अब यहाँ निरुक्तकार इतिहास शब्द का प्रयोग करते है इसका अर्थ यह नही की वेदोंमें इतिहास सिद्ध है, इसका अर्थ तो यह है की वे उन लोगोंकी बात कर रहे है जो वेदोमें इतिहास ढुँढते रहते है | यही प्रमाण सत्य एवं तर्कशुद्ध है | आचार्य का भी वही है |
यही नियम उपरोक्त उर्वशी-पुरुरवा संवाद जिसको आप वेदोंमे इतिहास सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हो उससे भी लगता है | हाँ हम ये नही अमान्य करते की उर्वशी या पुरूरवा की कथा घटी ही नही होगी, वह इतिहास हुआ भी होगा | किन्तु वेदोंमे वर्णित जो पुरुरवा उर्वशी का वर्णन है वह ऐतिहासिक न होकर अलङकारिक सिद्ध होता है | कैसे यह हम देखते है |आप यहाँपर इसी आचार्य शङकर का नाम लेके उनको वेदोमें इतिहास माननेका आरोप कर रहे है इसका निराकरण भी स्वयं आचार्यने तो किया ही है | किन्तु आपके सहाय्यार्थ अब हम एक और विद्वान का भाष्य प्रस्तुत करते है जो स्वयं आचार्य वेदोमें इतिहास नही सिद्ध करते यही मन्तव्य प्रकट कर रहा है, देखिये


ब्रह्मवैवर्तपुराण भाग २ भूमिका पृष्ठ २-३ आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली प्रकाशन
यह ग्रन्थ आपको आंतरजालपर प्राप्त भी हो सकता है आपको इस धागेंपर प्राप्त हो
इसके चित्र हमने जोड दिये है अन्त में |
देखिये यहाँ लेखक भूमिका में यही कह रह है की जो लोग आचार्य के उपरोक्त बृहदारण्यक वचन को लेकर पुराणोंपर भी वेदोंके समान प्रादुर्भाव का अर्थात अपौरुषेयता का आरोप कर रहै एवं आचार्य वेदोंमे उर्वशी पुरुरवा यह अनित्येतिहास मानते है यह आरोप कर रहै, वह सब मिथ्या है | इन लोगों की यह भूल है यही इस लेखक का कहने का तात्पर्य है |आपके हेतु मैने वह संस्कृत मूल भूमिका चित्ररुपसे जोड दियी है, कृपया अवलोकन करें ! विस्तार के कारण उस पूर्ण भूमिका का हम अनुवाद दे नहीं सकते है | आप स्वयं पढ ले | तैत्तिरीय आरण्यक अथवा बृहदारण्यक इन जगहोंपर जहाँ भी पुराण शब्द का वेदोंके साथ उल्लेख आया है उससे पुराण वेदोंके समान नही होते वरन् वे पश्चात्केही प्रकट होते है | यहाँ ध्यान रहे की यह लेखक कोई आर्य समाजी नही है वरन् आचार्य कोही माननेहारा है अपितु अद्वैतीही है | यह द्रष्टव्य है | क्यौंकि आजकल के वैदिक विद्वान वेदोमे इतिहास केवल आर्य समाजी भाष्यकारही नही शोधते इस भ्रम के शिकार है | हमने उपर निरुक्तकार यास्क, स्कंद स्वामी, आचार्य शङकर, उनकेही एक पीठासीन आचार्य इन सबका प्रमाण दिया है | अस्तु |
अत: वेदोमें किसी भी अनित्य मानव का इतिहास होही नही सकता | इसका कारण यही है की वेदोंके सर्व शब्द यौगिक अर्थ के है और नाही लौकिक अर्थ के | वेद सृष्टी के आरम्भ में ही प्रकट हुए हैं इसका प्रमाण स्वयं श्वेताश्वेतर उपनिषद भी देता है
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै |
अब आप जिस महापुरुष आद्य शङकराचार्य का उदाहरण दे रहे है उन्होनेंही उसका क्या अर्थ किया है यह देखिये आपका समाधान हो जायेगा ! उपरोक्त आनन्दाश्रमकी लेखावली का लेखक उसपर भाष्य करता हुआ उस भूमिका में लिखता है की
"यो ब्रह्माणं विदधाति... (श्वेता. ६.१८)
इत्यादिश्रुतिस्मृतिवचनेभ्यो भगवतो वेदस्यैव प्राकूभावत्वं स्फुटी भवति |न खलु पुराणस्य |
इसमें वह लेखक विद्यारण्य स्वामी एवं अन्तमें आचार्यके उपरोक्त बृहदारण्यकके " पुराणमसद्वा" श्लोकार्ध का उल्लेख करते हुए लिखते है की
"श्रीभगवत्पूज्यपादा अपि बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये लिलिखु: | एवमन्यत्रापि |"
आपसे विनती है की आप यह पूर्ण संवाद पढे एवं इससे आचार्य भी वेदोंमे इतिहास नही मानते यह ज्ञान करलें |


अब मनुस्मृती का सिद्धांत देखते है 👇
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणिच पृथक् पृथक् !
वेदशब्देभ्यः एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे !
मनु - १.२१
इसका अर्थ तो सरल है की
अर्थ - उस परमात्माने निश्चय करके सब के नाम, कर्म और पृथक् व्यवस्थायें आदिसृष्टीमेंही वैदिक शब्दोंसे भिन्न भिन्न निर्माण कीं |
इससे स्पष्ट है की वेदोंके शब्द प्रथम है एवं लौकिक व्यक्तीओंका इतिहास पश्चात का है एवं उन लौकिक व्यक्ती जैसे राम, कृष्ण, उर्वशी, पुरुरवा आदि लोगोंके नाम वेदोंसेही लिए है | किन्तु इससे उनका इतिहास वेदोंमें सिद्ध न हो कर यह नाम प्रत्युत योगिक सिद्ध होते है और नाकी लौकिक | पश्चात में उनके अर्थात ऐतिहासिक व्यक्तिओंके नाम इन वेदोंके योगिक नामों के अर्थोंसे रखे गये है |
अब आप जिस आचार्य शङकर का नाम दे रहे है उन्होनेंही यह सिद्धांत स्वयं उनके ब्रह्मसूत्र भाष्यमें १/३/३० इस सूत्रमें
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्स्मृतेश्च।
इसपर वे आद्य शङकराचार्य कहते है
ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टय |
शर्वयन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ||
अर्थ - ऋषियोंके जो नाम थे और वेदकी जो शक्ति थी, पुन: प्रलयके अन्तमें उत्पन्न होनेपर अजने अर्थात् ब्रह्माने उन्हीं नामों और शक्तियोंको उन्हें दिया |

पृष्ठ ७०९ - शाङकरभाष्य - रत्नप्रभा - भाषानुवादसहित - भाष्यकार गोपीनाथ कविराज
विक्रम संवत १९९३
आपने आचार्य को भी वेदोमें इतिहास सिद्ध करनेहेतु काम पे लगा रहे है जो उनके स्वयं का मन्तव्य नही है |
कुर्मपुराणमभी उपरोक्त सिद्धांतही कथन किया है
कूर्मपुराणम्-पूर्वभागः/सप्तमोऽध्यायः
वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः ।
आर्षाणि चैव नामानि याश्च वेदेषु सृष्टयः ।७.६८
शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ।।
यथर्त्तावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।७.६९
लिङ्गपुराणम् - पूर्वभागः/अध्यायः ७० यहाँभी यही सिद्धान्त है |
हमने तो पूर्वमेहीं स्कन्दस्वामी नामक ऋग्वेदके प्रथम भाष्यकार का सन्दर्भ दे कर कहा था की वेदोमें आये हुए देवापि-शान्तनु आदि शब्द यह यौगिक अर्थ के है जिसमें वे कहते है
देवापि विद्युत | शन्तनुरुदकम् |
किन्तु परवर्ती साहित्य में यह ऐतिहासिक है |हम मानते है की महाभारतमे तो शांतनु भीष्म का पिता है | इसे हम नकारते भी नही कभी | किन्तु आप जैसे लोक वेदोंमे यदि शान्तनु शब्द आया तो उसे भीष्म के पिता के साथ जोडनेका जो यत्न करते है वह अप्रस्तुत तो हैही वरन् वैदिक सिद्धान्तोके विपरीत भी है | इस लिए आपसे विनती है की सत्य का स्वीकर करें |
अब उर्वशी पुरुरवा के सन्दर्भ में अन्तिम सन्दर्भ देते है | आचार्य वररुचि ऋग्वेद के १०.९५.१४ इस मन्त्रमें जहाँ उर्वशी एवं पुरुरवा का संवाद है वहाँ भाष्य करते हुए लिखते है
"नैरुक्तपक्षे तु पुरुखा मध्यमस्थान: वाय्वादीनामेकत्वात्, पुरु रोतीति पुरुरवा: उर्वशी विद्युत् |
अर्थ - नैरुक्तपक्ष में तो पुरुरवा को मध्यमस्थानी एवं उर्वशी को विद्युत कथन किया गया है !
इससे भी सिद्ध होता है की वेदोमें वर्णित उर्वशी-पुरुरवा संवाद ना किसी ऐतिहासिक पक्ष का है अपितु वह यौगिक अर्थसे विद्युत एवं मध्यमस्थानी का है |इससे भी आपके आक्षेप का निवारण होता है |
अत: वेदोमें आचार्य शङकर उर्वशी एवं पुरुरवा का इतिहास सिद्ध करते है यह आपका अर्थ निराधार एवं मूलहीन है | आप व्यर्थही आचार्य पर यह आरोप कर रहे है |
अस्तु !


आक्षेप क्रमांक द्वितीय -
आचार्य आदि शंकरने अपने शारीरीक भाष्य के प्रथम अध्यायके तृतीय पाद के २९वे सूत्रपर अपने भाष्य मे व्यासोक्ती मे एक श्लोक दिया है..
युगांतेsन्तर्हितान वेदान सेतिहासान महर्षयः।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयंभुवा।।
भावार्थ: युगो के अंत मे इतिहास के साथ वेद अदृश्य हो गये थे। किंतु, महर्षीयोने प्रथम ब्रम्हदेवकी आज्ञा प्राप्त कर अपने तपोबलसे वो सेतिहास (स-इतिहास) वेद पुनरपि प्राप्त किये।

समाधान - इसका अर्थ ये तो नही सिद्ध करता की वेदोमें मानव इतिहास होता है | यह तो आपका मनगढन्त अर्थ एवं कल्पना ही है | क्यौंकि हमने आचार्यकेही भाष्य से आचार्य की भूमिका उपरोक्त लेख में स्पष्ट कर दी है | अस्तु |

आक्षेप क्रमांक तृतीय -
अमरकोष आदि प्राचीन कोशों में पुराण के पांच लक्षण माने गये हैं :
सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि सूचियां), मन्वन्तर (चौदह मनु के काल), और वंशानुचरित (सूर्य चंद्रादि वंशीय चरित) ।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् ॥
(१) सर्ग – पंचमहाभूत, इंद्रियगण, बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन।
(२) प्रतिसर्ग – ब्रह्मादिस्थावरांत संपूर्ण चराचर जगत् के निर्माण का वर्णन।
(३) वंश – सूर्यचंद्रादि वंशों का वर्णन
(४) मन्वन्तर – मनु, मनुपुत्र, देव, सप्तर्षि, इंद्र और भगवान् के अवतारों का वर्णन।
(५) वंशानुचरित – प्रति वंश के प्रसिद्ध पुरुषों का वर्णन।

समाधान - आप पुराण शब्द के अर्थ करनेसे उनको वेदोंके समान यदि अपौरुषेय सिद्ध करना चाहते है तो आप हमारे उपरोक्त लेख को पुनश्च पढिये | हम सिद्ध कर चुके है की वेद पहले है एवं उसके आधार पर पुराणोंकी रचना व्यासजीने की है | और वो भी प्रक्षेपोंको छोडकर | और पुराण शब्द का अर्थ इतिहास है और जो जो ग्रन्थ ऐतिहासिक है वह सर्व पौरुषेय अर्थात मनुष्यकृत अथवा ऋषिकृत है |वह कभीभी वेद नही हो सकता |

आक्षेप क्रमांक चतुर्थ - : ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।। - अथर्ववेद ११.७.२.
मनु महाराज कहते है:
स्वाध्यायं श्रावयेत पित्रे धर्मशास्त्राणि चैवहि।
आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलान्यपि।।
अर्थात: (श्राद्ध काल मे) पितरों को वेद, धर्मशास्त्र, आख्यान, इतिहास और सारे पुराण सुनाने चाहिये।
आज के तमोयुगी कली में प्रायः कुछ लोग 'पुराण' शब्द की अपने अपने तर्क को सत्य साबित करने के लिए अलग अलग व्याख्यायें, भावार्थ रखते है।
किंतु; आचार्य आदि शंकर से बड़ा शास्त्रों का ज्ञाता आज के समय मे संभवतः कोई नही। उनसे अधिक शास्त्र का ज्ञान सांप्रत मोहग्रस्त काल मे किसी को नही होगा। सो आचार्य आदि शंकर पुराण व इतिहास इस संबंध में क्या कहते है? वो भी हम अगली पोस्ट में देख ले।
#वेद_पुराण_इतिहास

समाधान - आपको हमने आचार्य के साहित्य का सन्दर्भ देकेही सिद्ध कर दिया है की पुराण शब्द का अर्थ इतिहास है | निरुक्तकार यास्क उसकी "पुरा नवं भवति" यह निरुक्ती देते है | पुराण इतिहास ग्रन्थ है और चुँकि वेदोंमें इतिहास पक्ष का खण्डन हम प्रथम लेख में आचार्य शङकर के साहित्यसेही कर आये है, तो यह आपकी शङका भी निर्मूल है | इस लेखसे आप पुराणोंको भी वेदोंके समान अपौरुषेय दिखाने का जो अट्ट्हास कर रहे है वह आचार्य शङकर एवं वैदिक सिद्धान्तोसे भी विपरीत है | फिर भी हम अन्तमें एक गोपथब्राह्मण का प्रमाण देते है जिससे इस लेखमाला का अन्त कर देंगे |
गोपथब्राह्मण पूर्व २.१०
एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिता: सकल्पा: सरहस्या: सब्राह्मणा: सोपनिषत्का: सेतिहासा: सान्वाख्याना: सपुराणा: सस्वरा: संस्कारा: सनिरुक्ता: सानुशासना: सानुमार्जना: सवाकोवाक्या: |
यहाँ ब्राह्मणकार स्वयं कह रहा है की कल्प, रहस्य, ब्राह्मण एवं अन्त तक के सर्व साहित्य आदि ग्रन्थ वेद नही है | अत: वे वेदोंके समान अपौरुषेय तो होही नही सकते | तथा उनमें इतिहास होने के कारण वे वेदोंके समान नही है | इससे भी वेदोमें इतिहास सिद्ध नही होता यह हमारा पक्ष प्रबल होता है अकाट्य प्रमाणों के साथ | अस्तु !
(लेख में दिये गये सर्व सन्दर्भ चित्र रुपसे संलग्न किये गये है, देखिये!)
अलमतिविस्तरेण बुद्धिमद्वर्य्येषु !
©तुकाराम चिंचणीकर
पाखण्ड खण्डिणी
Pakhandkhandinee.blogspot.com

Tuesday, 26 September 2017

वैदिक स्त्री-दर्शन - लेखांक तृतीय



शारदीय नवरात्रोत्सवानिमित्त विशेष लेखमाला...


वैदिक स्त्री-दर्शन - लेखांक तृतीय

मागच्या लेखामध्ये आपण स्त्रियांचा वेदाधिकार ह्यांविषयी संवाद केला. आता ह्या लेखांपासून वेदांमधील स्त्री-दर्शनाचा प्रत्यय घेणार आहोत.
स्त्रियांचे व्यक्तिमत्व स्वरुप व कार्य
दैनंदिन जीवनामध्ये स्त्रियांचे व्यक्तिमत्व चिंतन करताना त्यांच्या एकुण स्वरुपाविषयी व कार्याविषयी आपणांस चिंतन करायचे झाल्यांस अनेक पैलु दृष्टिगोचर होतात. जसे की
१. धर्मनिष्ठा, २. भोजन बनविणे (स्वयंपाक), ३. पशुपालन ४. गृहकार्य, ५. कुटुंबाचे नियंत्रण व नियोजन व व्यवस्था, ६. पवित्रता, ७. पती सेवा, ८. पत्नीचे अधिकार, ९. सम्राज्ञीचे पद, १०. सौभाग्यवतीचे पद ११. दीर्घायुष्य, १२. उत्तम व बलसंपन्न संतती निर्माण, १३. ईश्वरोपासना, १४. यज्ञाधिकार, १५. स्नानसंध्या, १६. आर्थिक नियोजन, १७. शिक्षण व वेदाधिकार १८. बालकांस शिक्षण व संगोपन
इत्यादि गोष्टींतून स्त्रियांच्या व्यक्तिमत्वाच्या व कार्याच्या स्वरुपांचे चिंतन वेदभगवानाच्या संदर्भांतून आपणांस करता येईल.


स्त्रीची धर्मनिष्ठा नि वेदचिंतन
स्त्री ही जात्याच धर्मपरायण व एकनिष्ठ असते. तिची लज्जा नि अनुद्धतता ही केवळ पुज्यच आहे सदैव. वेदांमध्ये स्त्रीविषयी जी विशेषणे योजिली आहेत त्यात अनेकानेक विशेषणांचे चिंतन आपणांस करायचे आहे. त्यात प्रामुख्याने
ऋग्वेदाच्या प्रथम मंडलात ३५, ३९, ११६, ११७ आदि सूक्तांमध्ये स्त्रींस वध्रिमती असे म्हटलंय. ह्या शब्दाचा अर्थ सांगताना वध्रि शब्द हा बंधन, इंद्रिय, दोरी आदि वाचक आहे. "प्रशस्ता वध्रिबन्धनम् अस्या अस्तीति वध्रिमती यद्वा प्रशस्ता वध्रय इन्द्रियाणि अस्या: सन्तीति" -जिचे बंधन प्रशंसनीय आहे अर्थात जी स्त्री धार्मिक नियमांनी स्वत:स बाध्य आहे, नियमांस कधीच तोडत नाही, जणु जी धर्मरुपी बंधनांनी किंवा दोरीने बांधली गेली आहे, जितेंद्रिय, धर्म्मपरायण, धर्म्मतत्त्ववेत्री अर्थात जाणणारी आहे तिला इथे "वध्रिमती" असे म्हटलंय. तींस प्रत्यक्ष परमेश्वर अर्थात हिरण्यगर्भ किंवा हिरण्मय पुरुष(परमेश्वरच) सूर्यासारखा तेजस्वी, निष्कलङक, पापांधकारनिवारक पुत्र प्रदान करतो असा भावार्थ आहे.
ह्यांच उपरोक्त सूत्रांमधील मंत्रांमध्ये स्त्रीस वर्त्तिका असे म्हटलंय. तो शब्द धर्मव्रतपरायण स्त्रीसाठी आलाय. "वर्तते धर्म्मस्यानुकूलेन या पुन: पुन: वर्तते सा वर्त्तिका" जी सदा धर्मानुकूल वर्तन करण्यांस पुन: पुन: तत्पर आहे अशी ती स्त्री !


स्त्रियांचे संघटन व विकास
ह्यांविषयी अथर्ववेद ११ व्या कांडात प्रथम अध्यायांत म्हणतो
ओ३म् शु॒द्धाः पु॒ता यो॒षितो॑ य॒ज्ञिया॑ इ॒मा आप॑श्च॒रुमव॑ सर्पन्तु शु॒भ्राः । अदुः॑ प्र॒जां ब॑हु॒लान्प॒शून्नः॑ प॒क्तौद॒नस्य॑ सु॒कृता॑मेतु लो॒कम् ॥
शुद्ध स्वभाव, पवित्र आचरण, पूजनीय, सेवायोग्य, शुभ्र चरित्राची गुणवैशिष्ट्ये असलेल्या ह्या स्त्रिया ज्ञानांस प्राप्त होवोत. ह्यां स्त्रियांपासून आम्हांस उत्तम संतान व बहुविध असे पशु प्राप्त झाले आहेत. इथे स्त्रियांना गौ आदि पशुंची देखभाल ठेवायची अपेक्षा आहे. कारण गौशिवाय दुध व तुप येऊच शकत नाही व त्याशिवाय यज्ञादि कृत्ये होऊ शकत नाहीत.
स्त्रियां उत्तम सुख देणार्या आहेत. त्यांची गुणवैशिष्ट्ये उपरोक्त मंत्रांत वर्णिली आहेत. ह्या संपूर्ण अध्यायांत स्त्रियांचे अतिशय उदात्त वर्णन आहे. स्त्रियांचे संघटन ह्या मंत्रांमध्ये सांगितले असून स्त्रियांनी गुणवती स्त्रीची निवड करावी असे सांगितलंय. स्त्रियांचा संघटनाधिकार इथे अधोरेखित आहे.

नारी ह्या शब्दाचा अर्थ
यजुर्वेदभाष्यामध्ये नारी शब्दाचा अर्थ स्पष्ट करताना महर्षी दयानंद सरस्वती म्हणतात
नराणामियं शक्तिमती स्त्री तत्सम्बुद्धौ
यजुर्वेद भाष्य - ५.२६
पुरुषांना शक्ती प्रदान करणारी अशी ती नारी.
पृष्ठ क्रमांक ४३३ - यजुर्वेद भाष्य - महर्षि दयानंद सरस्वती 

गृहकार्य
वेद सांगतो की स्त्रियांनी पवित्र, निर्मळ नि पुजनीय बनून आपल्या गृहकार्यांत संलग्न व्हावे. घरामध्ये पाणी व अन्नाचा उत्तम प्रबंध करावा. भात आदि अन्न तयार करणार्या स्त्रिया ह्या उत्तम कर्म करणार्या लोकांच्या स्थानांस प्राप्त होवोत. ह्यातून स्त्रियांना स्वयंपाकादि गोष्टी करणे हे अतिशय अभिमानास्पद कार्य सांगितले असून त्यानेही स्त्रियांस उत्तम गती प्राप्त होते असा भावार्थ आहे. भोजन हे उत्तम, बलवर्धक गुणकारक व सुस्वादु असावे असे वेद सांगतो.


पशुपालन व सदाचार युक्त मधुर भाषण
हे कार्य केवळ पुरुषांचेच नसून स्त्रियांचेही आहे असे सांगताना अथर्ववेद ११.१.२२ येथे म्हणतो
ओ३म् अ॒भ्याव॑र्तस्व प॒शुभिः॑ स॒हैनां॑ प्र॒त्यङे॑नां दे॒वता॑भिः स॒हैधि॑ । मा त्वा॒ प्राप॑च्छ॒पथो॒ माभि॑चा॒रः स्वे क्षेत्रे॑ अनमी॒वा वि रा॑ज ॥
इथे स्त्रियांनी गौआदि पशुंचे पालन अशा प्रकारे करावं की ते त्यांस अगदी प्रिय होतील.
शिवी, शाप किंवा व्यभिचार तुम्हांस प्राप्त न होवो अशी वेद भगवान इथे स्त्रियांस प्रार्थना करतो. स्त्रिया ह्या सतत मृदुभाषणी, सत्यवचनी व चारित्र्यसंपन्न असाव्यांत अशी वेद अपेक्षा राखतो. जर स्त्रियांस आपल्या पतींस सदैव अनुकूल ठेवायचे असेल तर तिने सतत मधुरभाषण व तेही सत्य तेच सांगावे. सत्यं ब्रुयात् मितं ब्रुयात् हे तत्व पाळावंच. असत्य भाषण कधीच करु नये, भले ते अप्रिय असो.
स्त्रियांना आपले कार्यक्षेत्र विस्तृत ठेवावे अशी वेद अपेक्षा करतो. वेदभगवान स्त्रियांस संकुचित व घरकामी कधीच अपेक्षा ठेवत नाही. चूल नि मूल एवढ्यांचपूरती स्त्रियांची अपेक्षा वेदभगवान करत नाही. तो स्त्रियांस व्यापक दृष्टीने विचार व कार्यप्रवृत्त होण्यांस सिद्ध करायांस सांगतो.

उत्तम स्वयंपाक घर
ओ३म् ऋ॒तेन॑ त॒ष्टा मन॑सा हि॒तैषा ब्र॑ह्मौद॒नस्य॒ विहि॑ता॒ वेदि॒रग्रे॑ । अं॑स॒द्रीं शु॒द्धामुप॑ धेहि नारि॒ तत्रौ॑द॒नं सा॑दय दै॒वाना॑म् ॥
अथर्ववेद - ११.१.२३
ह्या मंत्रामध्ये स्त्रींस उत्तम स्वयंपांक घराची प्राप्ती होऊदेत अशी प्रार्थना आहे.

स्त्रीही ही कल्याणकारी आहे.
ओ३म् शि॒वा भ॑व॒ पुरु॑षेभ्यो॒ गोभ्यो॒ अश्वे॑भ्यः शि॒वा । शि॒वास्मै सर्व॑स्मै॒ क्षेत्रा॑य शि॒वा न॑ इ॒हैधि॑ ॥
अथर्ववेद - ३.२८.३
ह्या मंत्रामध्ये स्त्रींस कल्याणी होऊदे अशी प्रार्थना आहे. स्त्री ही पुरुषाचेच नव्हे तर जगाचे कल्याण करणारी अशी भावना ह्या मंत्रामध्ये वेदभगवान बाळगतो.
पित्याच्या घरी उत्तम शिक्षा
वेदभगवान स्त्रींस पित्याच्या घरी वेदादि षट्शास्त्रांचे व उत्तम नीतिनियमांचे व पवित्र आचरणांची शिक्षा प्रदान करा अशी आज्ञा देतो. म्हणूनच अथर्ववेद 'ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतीम्' असे म्हणतो.

स्त्री ही पूर्णायु प्राप्त करो
पुत्र आणि नातवंडांच्या समवेत क्रीडा करत स्त्री आनंद प्राप्त करो. ह्यातून वेदभदवान स्त्रींस दीर्घायुष्य चिंतितो.
वेदभगवान तसेही चारशे वर्षांचे आयुष्य ऋग्वेदामध्ये चिंतितोच आहे. अथर्ववेदामध्ये शरद:शतम् आदि मंत्रांमध्येही शंभर वर्षांची आयु सांगितलीच आहे.

पवित्रता
स्त्रीने आपली वस्त्रे पुरुषांस कधीही प्रदान करु नयेंत असे अथर्ववेद १४.१.२० येथे सांगतो.
सुखप्राप्ती साठी तींस सुवर्ण, जलादि सर्व वस्तु प्राप्त होऊन ती पतींसह सुखी होवो अशी प्रार्थना अथर्ववेद १४.१.४० येथे करतो.


स्त्री ही घराची सम्राज्ञी आहे.
अथर्ववेद १४.१.४३ येथील मंत्रामध्ये ज्याप्रमाणे बलवान समुद्राने नदींचे चक्रवर्ती साम्राज्य निर्माण केले आहे तसेच पतीच्या घरात जाऊन स्त्री ही सम्राज्ञी बनु अशी आज्ञा करतो.

ऋग्वेदामध्ये सुद्धा हाच भाव व्यक्त करताना १०.८५.४६ येथे
स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव स॒म्राज्ञी॑ श्व॒श्र्वां भ॑व ।
ननां॑दरि स॒म्राज्ञी॑ भव स॒म्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॑ ॥
तु सासर्यांसाठी तुझ्या आचरणाने सम्राज्ञीचे स्थान प्राप्त कर. सासुसाठीही सम्राज्ञी हो. नणंदेसाठीही सम्राज्ञी हो व माझ्या भावांसाठी अर्थात तुझ्या दीरांसाठीही घरात तु सर्वांची सम्राज्ञी हो.
ह्या मंत्रातून ऋग्वेद स्त्रींस किती उच्च स्थान प्राप्त करण्याची आज्ञा देतो हे आपणांस कळते. हे स्थान तिने तिच्या शुद्ध आचरणाने व व्यवहाराने, मृदु भाषणाने प्राप्त करायचे आहे.
हे ऋग्वेदाचे दशम मंडलातले ८५ वं सूक्त हे पूर्ण स्त्री-पुरुष विवाह व त्यांचे भावी आचरणांसंबंधी अतिशय उदात्त चिंतन प्रकट करणारे आहे.

दांपत्यजीवनांचे अत्युत्कृष्ट चिंतन उपरोक्त ऋग्वेद सूक्तामध्ये आहे.
ह्या दांपत्यजीवनामध्ये आकांक्षांचे व वैदिक आर्यांना स्त्रीपासून काय अपेक्षित असावे ह्याचे उत्कृष्ट चिंतन उपरोक्त सूक्तामध्ये ऋग्वेदांत आहे. नवीन गृहात संसारास येणार्या स्त्रींने घरातील लोकांची मने कशी जिकांवीत व तिचे आचरण कसे सम्राज्ञी समान असावे ह्यांचे इतके सुदंर दिग्दर्शन असताना काही मूढ लोक प्राचीन काली आर्यांना विवाहसंस्थेचे ज्ञान नव्हते व ते अतिशय विकृतावस्थेत जगत होते हे मत बाळगतात व त्यावर ग्रंथ लिहितात हे त्यांचे मत किती फोलपणाचे व अज्ञानदर्शक आहे हे इथे सिद्ध होते.

राजवाड्यांच्या विवाहसंस्थेच्या इतिहासाची विकृती
त्यांच्याविषयी पूर्ण आदर बाळगूनही राजवाड्यांनी त्यांच्या उपरोक्त ग्रंथांत उपरोक्त सूत्रांचे एकुणच वैदिक ऋचांचे काढलेले अतिशय घाणेरडे व विकृत अर्थ व त्यावरून भारतीय विवाहसंस्थेचा केलेला एक टिपणात्मक अभ्यास हा किती विकृत आहे हे त्यांच्या अज्ञानमूलकतेचे प्रदर्शक तर आहेतच पण त्यांचा तो ग्रंथ वाचून हिंदुंच्या विवाहसंस्थेविषयी वाट्टेल ते विकृत तर्क करणारे द्वेष्टे लोकही किती अंध आहेत हे वेगळं सांगायची आवश्यकता नाही. ह्या संपूर्ण सूक्ताचा अभ्यास केला तरी वैदिक आर्यांची दांपत्यजीवनाची कल्पना सर्वसामान्यांस आकळेल. पण काय करणार? पाश्चिमात्यांना बुद्धी गहाण टाकल्यांवर मनुष्य असे विकृत ग्रंथच लिहिणार. असो त्याची समीक्षा स्वतंत्रपणे भविष्यात करणारच आहे. ज्यांना राग येतो त्या राजवाडे भक्तांनी माझे लेख वाचु नयेत. मी स्पष्टवक्ता आहे. वेदांचा अकारण अपमान सहन केला जाणार नाही, मग तो कुणीही करो.
एकमेकांविषयीच्या एकनिष्ठेवाचून खरे सुखी दांपत्य जीवन असू शकत नाही. परस्परांतील द्वैत समूळ नष्ट करून एकात्म प्रेम उत्पन्न करण्याबरोबरच इंद्रियनिग्रह व कर्तव्यनिष्ठा, दक्षता आणि स्वार्थत्याग याही गोष्टींची पूर्ण जाणींव आर्यांस उपरोक्त वेदवचनांवरूनच प्राप्त होती असे म्हणण्यांस कोणताही प्रत्यवाय नाही.
ह्यां स्त्रींस सुपुत्रवती व सौभाग्यवती कर अशी आज्ञा ह्याच सूक्तामध्ये आहे हे वेगळं सांगायची आवश्यकता नाही.


सर्वांत उदात्त संकल्पना
इ॒मां त्वमिं॑द्र मीढ्वः सुपु॒त्रां सु॒भगां॑ कृणु ।
दशा॑स्यां पु॒त्राना धे॑हि॒ पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि ॥
ह्या मंत्राचे दोन अर्थ वेगवेगळ्या भाष्यकारांनी काढले आहेत. आर्य समाजी भाष्यकारांनी ह्यांत पतींस एकादशावा पुत्रनिर्माण कर असा अर्थ काढला आहे. पण बाळशास्त्री हरदासांनी त्यांच्या "वैदिक राष्ट्रदर्शन" नामक पुण्यातल्या व्याख्यानमालेत, ज्याचे ग्रंथ द्विखंडात प्रकाशितही आहेत, त्याची पीडीएफ हवी असल्यांस देईनच, त्यांनी निम्नलिखित अर्थ काढलाय.
ह्या मंत्रामध्ये दहा पुत्रांस तु जन्म देऊन अकरावा पती कर अशी आज्ञा आहे. म्हणजेच दहा पुत्रांनतर तो पती तिचा एकादश अर्थात अकरावा पुत्र होवो अर्थात तिथे त्यांचे पती-पत्नी संबंध संपुष्टांत येऊन ती त्याचा पुत्रवत सांभाळ करेल. ही इतकी विशुद्ध संकल्पना केवळ वेदच सांगु शकतो.
ऋग्वेदांतील सौभाग्यवती स्त्री !
ह्याच सूक्तामध्ये अनेकवेळा स्त्रींस सौभाग्यवती व उत्तम संतती प्राप्त करणारी असे म्हटलंय.

संतती कशासाठी तर अमरत्वासाठी!
संतती प्राप्तीचा हेतु हा त्या संततीने विलक्षण कर्तृत्व करून तींस व सर्व कुटंबांस आपल्या कीर्तीने व कर्तृत्वाने अमरत्व प्राप्त करून द्यावे अशी अपेक्षा ऋग्वेद ५.४.१० येथे व्यक्त करतो.

उत्तम व पराक्रमी संततीची अपेक्षा
अथर्ववेदामध्ये वैदिक गृहिणीने आपली मूलें ही शत्रुंचा नि:पात करणारी, तेजस्वी असावीत अशी प्रार्थना आहे. ती स्वत: तेजस्वी व सौभाग्यशाली असावी व पतीची कीर्ती सर्वत्र पसरावी.
अनेकांच्या विवाहामध्ये ऋग्वेदांतले उपरोक्त हेच मंत्र म्हटले जातात. जिथे घाई गडबड नसते तिथेच अर्थात ! असो.

स्त्रीने ज्ञानप्राप्ती करायची आहे.
अथर्ववेदामध्ये १४.१.६४ येथे स्त्रींस सर्व प्रकारचे म्हणजे भूत, भविष्य व वर्तमान असे तीन्ही प्रकारचे ज्ञान प्राप्त करुन पतीसेवेंत रुजु होण्यांस सांगितलेय. वेद हा तीन्ही काळात असल्यामुळे त्यांचे अध्ययन इथे तींस अपेक्षित आहे.


ब्रह्मचर्य पालनाचा अधिकार व वेदग्रहण 
यजुर्वेदामध्ये ३४.१० येथे स्त्रींस विवाहपूर्व ब्रह्मचर्य पालन करून वेदादि षट्शास्त्रांचे अध्ययन करून उत्तम पतींस प्राप्त करण्यांचा आदेश आहे. जर योग्य पती प्राप्त न झाल्यांस तिने आजीवन अविवाहित राहावे व ब्रह्मचर्याचे पालन करावे पण अयोग्य पतींस वरु नये अशी वेदभगवान इथे आज्ञा देतो.
मनुस्मृतीतही "काममरणादिगच्छेद" येथे हाच अर्थ अभिप्रेत आहे. असो त्यांवर सविस्तर लेखामाला भविष्यांत येईलच.


सूर्यदर्शन दीर्घायुसाठी
स्त्रियांनी सूर्याचे दर्शन सतत घेतले पाहिजे व स्वच्छ सूर्यप्रकाशात विचरण केले पाहिजे अशी वेदांची आज्ञा अथर्ववेदांत १४.२.५ येथे आहे. सूर्याची किरणे ही शरीरांस आरोग्यदायक आहेत हे वेदभगवान किती तरी आधीच सांगून ठेवतो, जे आधुनिक विज्ञान आज आम्हांस सांगते. असो..थोडक्यांत स्त्रियांनी स्वच्छ प्रकाशांत राहायला हवं. कोंडून घेता कामा नये. वेदांमध्ये सूर्य-रश्मी चिकीत्साही स्वतंत्रपणे आहेच आहे. कारण सूर्यकिरणांनी अनेक जंतु व कृमी नष्ट होतात असे वेदभगवान स्पष्टपणे अथर्ववेद २.३२.१ येथे सांगतो व रोग नष्ट होतात हे ६.३.८ येथे सांगतो ..म्हणून स्त्रियांनी स्वच्छ सूर्यप्रकाशाचा आस्वाद घेतलाच पाहिजे हे आरोग्यदायक सूत्र वेदभगवान सांगतो.

विवाह हा केवळ संतानोत्पत्तीसाठी, शरीरोपभोगासाठी नव्हे.
विवाहाचा दिव्य उद्देश्य वेदांमध्ये केवळ कामवासनेच्या तृप्तीसाठी नसून उत्तम संतान प्राप्ती जी राष्ट्रनिष्ठ व धर्मनिष्ठ असावी, ज्याचे वर्णन वरही केलंय, ह्यासाठीच आहे. स्त्री-पुरुषांनी केवळ ऋतुगामी व्हावं म्हणजे ऋतुकालातच समागम करावी अशी स्पष्ट आज्ञा वेदभगवान देतो. विवाह म्हणजे अनियंत्रित संभोगांचे लायसन्स नाहीये. इंद्रियसंयम हवाच. हा विवेक वेदभगवान सांगतो.

सुखदायिनी सर्वांसाठीच
स्त्री ही सर्व कुटुंबासाठीच सुखदायिनी, सुमंगला, घराची वृद्धी करणारी, सासर्यांस शांति प्रदान करणारी व सासूंस आनंद देणारी व्हावी असे अथर्ववेद १२.२.२६ व १४.२.२७ येथे सांगतो. घरातल्या सर्व नियमांचे उत्तम पालन करणारी अशी होवो.

ईश्वरोपासक स्त्री (अग्निहोत्रादि संध्यादि कर्मे)
अथर्ववेदामध्ये स्त्रींस १४.२.२४ येथे अग्नीची अर्थात ईश्वराची उपासक म्हटलंय. ह्यावरूनच स्त्रींस यज्ञाधिकार व वेदाधिकार स्पष्टय हे सिद्ध आहे. माझ्या द्वितीय लेखांकातही मी तो सिद्ध केलेलाच आहे. विस्तार करत नाही. पण ह्यातून तिलाही ईश्वरोपासनेचा अधिकार स्पष्ट होतो. अग्निहोत्र, संध्यादि कर्मे नित्य करायला हवीत. ह्या अर्थाचे स्पष्ट मंत्र वेदांमध्ये आहेत, विस्तार करत नाही.

सदा आनंदी राहणे
वेदभगवान अथर्ववेदामध्ये १४.२.४३ येथे स्त्रींस सतत आनंदी राहण्याची आज्ञा देतो.

स्त्रियांची भूमिका
ऋग्वेदामध्ये १०.१५९.२ येथे स्त्रींस
अ॒हं के॒तुर॒हं मू॒र्धाहमु॒ग्रा वि॒वाच॑नी ।
ममेदनु॒ क्रतुं॒ पतिः॑ सेहा॒नाया॑ उ॒पाच॑रेत् ॥
मी ज्ञानवती, घराची मुख्याधिकारी, धैर्यशाली व्याख्याती आहे. शत्रुंचा नाश करणारी आहे म्हणून पतीने माझ्या अनुकूल आचरण करावे.
इथे स्त्रीच्या अनुकूल पतीने आचरण करावे अशी स्पष्ट आज्ञा दिलीय. म्हणजे दोघांनीही एकमेकांच्या अनुकूल आचरण करायला हवं हेच सर्वत्र स्पष्ट होते.
पुढच्या मंत्रांमध्ये तिचा पुत्र शत्रुनाश करणारा, तिची पुत्री तेजस्विनी व ती स्वत: तेजस्विनी असा आशय आहे.


विवाहाचे वय
आ धे॒नवो॑ धुनयंता॒मशि॑श्वीः सब॒र्दुघाः॑ शश॒या अप्र॑दुग्धाः ।
नव्या॑नव्या युव॒तयो॒ भवं॑तीर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेकं॑ ॥
ऋग्वेद - ३.५५.१६
वेदांविषयीच्या स्त्री चिंतनाचा महत्वाचा विषय म्हणजे स्त्रियांच्या विवाहाचे वय ! वेदभगवान स्त्रींस संपूर्ण यौवनावस्था प्राप्त केल्यांवरच विवाहांस पात्र समजतो, आधी नाही. मनुस्मृतीतही "त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत्" ह्या श्लोकांतही मासिक धर्म प्राप्त झाल्यानंतर तीन वर्षांनंतर विवाह करायची आज्ञा आहे. ह्यांस सुश्रुतस्थानाचेही प्रमाण आयुर्वेदांतले आहेच आहे. त्यांवर सविस्तर कधीतरी लिहीनच. पण तूर्तांस बालविवाह निषेध ऋग्वेद तरी करतोच करतो हे सांगणे न लगे. स्त्रींस योग्य यौवनावस्था प्राप्त झाल्यांवरच तिने विवाह करावा व तोही योग्य पतीशींच.
थोडक्यांत उपरोक्त लेखनांतून स्त्रियांविषयीचे धर्मनिष्ठ, राष्ट्रनिष्ठ, पराक्रमी, शूर, पतीचे हित करणारी, सम्राज्ञी पदाची पात्रता धारण करणारी, ईश्वरोपासक, संध्यादि कर्मे नित्य करणारी, पवित्रता प्राप्त असलेली, सौभाग्यवती, सर्वांचे कल्याण करणारी, ब्रह्मचर्य पालन करणारी इंद्रियसंयमी, सदाचारयुक्त भाषणादि आचार संपन्न अशी, संघटन कुशल अशी, ज्ञानवती, गृहकृत्यदक्ष वगैरे वगैरे गुणवैशिष्ट्यांचे चिंतन आपणांस प्राप्त झालेले आहे.
पुढील लेखांत आणखी सविस्तर चिंतन करुच.
तूर्तांस लेखणींस विराम !
भवदीय,
तुकाराम चिंचणीकर
पाखण्ड खण्डिणी
Pakhandkhandinee.blogspot.com
#स्त्रीदर्शन 

Sunday, 24 September 2017

वैदिक स्त्री-दर्शन - लेखांक द्वितीय - स्त्रियांचा वेदाधिकार

शारदीय नवरात्रोत्सवानिमित्त विशेष लेखमाला
वैदिक स्त्री-दर्शन - लेखांक द्वितीय - स्त्रियांचा वेदाधिकार 
मागच्या लेखांत आम्ही वेदांविषयीची आमची भूमिका स्पष्ट केली. आता ह्या लेखांमध्ये एका महत्वाच्या प्रश्नाची उकल करणार आहोत की जी लेखमालेच्या दृष्टीने महत्वाची आहे. ती म्हणजे स्त्रियांचा वेदाधिकार ! जर स्त्रियांना वेदाधिकारच नसेल तर त्यांच्याविषयी वेद काय म्हणतो नि नाही हे पहायची आवश्यकताच काय? पण वेदांचा अधिकार स्त्रियांना आहेच आहे. म्हणूनच हा लेखनप्रपंच !
सर्वप्रथम प्रश्न येतो तो स्त्रियांच्या वेदाधिकाराचा !
दे॒वा ए॒तस्या॑मवदंत॒ पूर्वे॑ सप्तऋ॒षय॒स्तप॑से॒ ये नि॑षे॒दुः ।
भी॒मा जा॒या ब्रा॑ह्म॒णस्योप॑नीता दु॒र्धां द॑धाति पर॒मे व्यो॑मन् ॥
ऋग्वेद - १०.१०९.४
ह्या मंत्रात स्त्रीस स्पष्टपणे उपनीता अर्थात उपनयन झालेली म्हटलंय. अष्टाध्यायी मध्ये ४.१.४९ येथे स्त्रींस स्पष्टपणे उपाध्यायी, आचार्या म्हटलंय. सिद्धांतकौमुदी स्त्रीप्रकरणामध्ये हा संदर्भ आहे. वेदांचा अभ्यासच नाही तर ती आचार्या कशी काय असु शकते??? त्यामुळे स्त्रियांना वेदाधिकार आहे हे स्वत: वेदभगवान उच्चरवाने उद्घोषून सांगतोय. त्यांना उपनयनाचा व यज्ञाचाही अधिकार आहे. परंतु नंतरच्या काळातले परवर्ती साहित्य जिथे जिथे स्त्रियांना वेदाधिकार नाकारते, तितके ते प्रक्षेपयुक्त असून ते वेदवरुद्ध असल्याने ते अप्रमाण आहे. स्त्रियांना वेदाधिकार आहेच आहे, ह्यात काडीमात्र शंका असायचे कारण नाही. ह्याविषयांवर मी अनेकवेळा भाष्य केलंय. प्रत्यक्ष चार संहितांमध्ये स्त्रियांना वेदाधिकार नाकारणारा एकही निषेधात्मक मंत्र कदापि नाही. नाही म्हणजे ना आणि ही ! जे लोक पश्चातच्या परवर्ती ग्रंथांना प्रमाण मानून स्त्रियांना वेदाधिकार नाकारतात, त्या मूर्खांविषयी व स्वमतांधांविषयी इथे संवादच न केलेला बरा. असो.
जर स्त्रियांना वेदाधिकार नसताच तर वेदांवरच्या अनेक सूक्तांवर स्त्रियांची नावे का असती? परमेश्वर जर पक्षपाती असता तर त्याने ही नावे वर ठेवलीच नसती. अनेकांना हा युक्तिवाद वाचून आश्चर्य वाटेल. तेंव्हा ज्यांना वेदांच्या सूक्तांवरची ऋषि व देवतावाचक नावे ह्यांविषयी चिंतन पहायचे असेल त्यांनी आमचा "वेदांतील ऋषि व देवता विवेचन" हा लेख वाचावा ही विनंती. किंवा पंडित भगवद्दत्त वेदालङकार लिखित "ऋषि-देव विवेचन" व ऋषि रहस्य" हे दोन ग्रंथ वाचावेत. पीडीएफ हवे असल्यांस आपणांस पाठवेन.
या दंप॑ती॒ सम॑नसा सुनु॒त आ च॒ धाव॑तः ।
देवा॑सो॒ नित्य॑या॒शिरा॑ ॥
ऋग्वेद - ८.३१.४
ह्या मंत्रामध्ये स्पष्टपणे दंपती असे दोघांचा उल्लेख करून स्त्रींस पतीसमीप बसून यज्ञाचा अधिकार सांगितलाय.
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतीम् !
अथर्ववेद - ११.५.१८
ह्या मंत्रांत कन्येंस ब्रह्मचर्य पालन करून उत्तम पतींस प्राप्त करण्याचा अधिकार आहे. हे ब्रह्मचर्य म्हणजेच वेदाध्ययन आहे, सर्वशास्त्रांचे अध्ययन ह्या अर्थानेच आहे.
वेदांतले स्त्रियांचे वेदाधिकार देणारे संदर्भ द्यायला आम्ही आरंभ केला की काही पौराणिक मंडळी
म्हणतात की स्त्रियांना यज्ञात पुरुषाच्या समीप बसायचा अधिकार आहे पण वेदमंत्र म्हणायचा नाही.
तर ह्या आक्षेपाचंही निवारण आता करुयांत. हे लोक ह्या निषेधासाठी वेदांतला एखादा मंत्राचा संदर्भ द्या म्हटलं की एकही देत नाही. आजपर्यंत कित्येकांना विचारला, एकानेही निषेधात्मक मंत्र वेदांतून दिलेला नाहीये. स्वमतांधतेसाठी हे लोक ज्या परवर्ती साहित्याचा संदर्भ आपल्या नकारासाठी योजितात आता त्याच परवर्ती साहित्यात स्त्रियांचा वेदाधिकार कसा मान्य केलाय ते पाहुयांत.
गोभिलगृह्यसूत्र २.१.१९
पश्चादग्ने: संवेष्टितङ्कटमेवञ्जातीयं वान्यत् पदा प्रवर्तयन्तीं वाचयेत् - प्र मे पतियान: पपन्था: कल्पतामिति !
अर्थ - इथे 'प्र मे पतियान्" ह्या मंत्राचा तिने पाठ करावा असे स्पष्ट निर्देश आहे.
आता आश्वलायन श्रौतसूत्र - १.११.१
वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेद्धोताsध्वर्युर्वा वेदोsसि वित्तिरसि !
अर्थ - वेद पत्नींस देऊन होता किंवा अध्वर्युने हा "
वेदोsसि वित्तिरसि.." मंत्र तिच्याकडून वदवून घ्यावा.
आता शौनकाचार्यकृत ऋग्विधान - अध्याय ३, खंड २२
इमामिति जपेत् कन्या नाभिमालस्य नित्यश: !११७!
एवमेव जपेद्भर्ता ततो दीर्घायुषो नु तौ !११८!
कन्येने "इमां त्वमिन्द्रमीढ्व:" ह्या ऋग्वेदातल्या १०.८५.४५ ह्या मंत्राचा नाभींस स्पर्श करून उच्चार करावा व असाच पतीनेही करावा तर निश्चित दोघांसही दीर्घायु प्राप्त होते.
पुढे ह्यातच अध्याय ४, खंड १२, ६३ वा श्लोक
इमामिति त्रिसूक्तेन दशकृत्वो दशावरम् !
सपत्नीं बाधते तेन पतिताश्चातीव मन्यते !
इमाम् हे ऋग्वेदातले सूक्त दहावेळा जपेल तर सवतींस हानी प्राप्त होते व तिचा पती तिचाच जास्ती आदर करतो. (थोडक्यात वशीकरण)
चारीही वर्णाच्या स्त्रियांना वेदाधिकार
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शुद्राणां स्त्रीजनेश्वर: !
यथाक्रमेण पुज्यैनां गन्धपुष्पजलाक्षतै: !८२!
कुंकुमालक्तकैर्दीपैर्माषान्नवटकै: शुभै: !
कुसुमैर्वत्सकञ्चापि मन्त्रेणानेन पाण्डव ! ८३!
ओं माता रुद्राणा दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि: !
प्र नु वोचं चिकितषे जनाय मा गामनागामादितिं वधिष्ट" नमो नम: स्वाहा ! ८४!
इत्थं सम्पूज्य गां पृष्ट्वा पश्चात्तां च क्षमापयेत् !८५!
भविष्यपुराण - उ. अ. ६९, श्लोक ८२-८४
अर्थ - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शुद्र ह्यांच्या स्त्रियांनी इथे क्रमश: त्या गायींस गन्धपुष्पजलाक्षतादिंनी पुजन करून कुंक, पुष्पयुक्तदीप, तथा उडदाचे डाळीने (इथे माषान्न शब्दाने उडीद हाच अर्थ अभिप्रेत आहे व तोच अर्थ शास्त्रसंमत आहे) व फुलांनी गोमातेंस "ओं माता रुद्राणां" हा ऋग्वेदांतला मंत्राने पुजा करावी.
ह्यावरून चारीही वर्णांच्या स्त्रियेंस वेदमंत्र म्हणायचा अधिकार सिद्ध होतो हे वेगळं सांगायचे नाही.
जाताजाता एक सांगतो. ह्या उपरोक्त माता रुद्राणां मंत्राचा अतिशय चुकीचा अर्थ पाश्चिमात्यांनी व त्यांचीच री ओढणार्या भारतरत्न काणेंसारख्या विद्वानांनी घेतलाय, ज्याचे खंडण सप्रमाण मी माझ्या "मधुपर्कात गोमांस किवां मांस आहे का" ह्या लेखांत केलंय. जिज्ञासूंनी माझ्या पाखण्ड खण्डिणी नामक ब्लौगवर सविस्तर वाचावा ही विनंती. असो तो वेगळा विषय तरीपण सांगितला.
कलिवर्ज्य प्रकरण नावाचे थोतांड
स्त्रियांना वेदाधिकार नाकारणारे आजचे स्वयंघोषित मंडळी ज्या कलिवर्ज्य प्रकरण नामक थोतांड प्रकरणाचा संदर्भ नकारासाठी देतात, की ज्यांत कलियुगांत स्त्रियांना वेदाधिकार अकारण नाकारला आहे, त्याची समीक्षा खरंतर स्वतंत्रपणे करावी लागेल. पण एकाच वाक्यांत सांगायचे झाले तर मनुस्मृतीत म्हटल्याप्रमाणे
धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुती: !
धर्मजिज्ञासेंत मनुष्यांस श्रुती अर्थात वेदच प्रमाण आहे, आणि हे वेद म्हणजे काय हे आम्ही प्रथम लेखांकात स्पष्ट केलंच आहे. तरीही ह्याच मनुस्मृतीत म्हटल्याप्रमाणे
या वेदबाह्या: स्मृतय: याश्च काश्च कुदृष्टय: !
सर्वास्ता निष्फला: प्रेत्य तमोनिष्ठास्तु ता: स्मृता: !
१२.९५
जे वेदबाह्य स्मृत्या आहेत, त्या त्याज्य आहेत कारण त्या कुदृष्टीने आल्यामुळे हे स्पष्ट म्हटलंय. ह्यावरूनच वेदांच्या विरोधात जाणारे कोणतेही वचन, मग भले ते कोणत्याही प्रकांड विद्वानांचे किंवा महाराजांचे असो, ते त्याज्य असल्याचे प्रमाण आहे हे. त्यामुळेच हे कलिवर्ज्य प्रकरण मागच्या काही शतकांतले असल्याने व त्यातही ते वेदविरुद्ध असल्याने ते त्याज्यच आहे.
वेदमंत्रांनी स्त्रियांच्या गर्भावर परिणाम होतो म्हणून नकार????
वेदाधिकार मान्य करणारे पण तरीही नकार देणारे काही लोक असा तर्क करतात की वेदमंत्रांनी अंगात उष्णता होते. त्याने स्त्रियांच्या गर्भावर परिणाम होतो म्हणून स्त्रियांनी वेदमंत्र म्हणु नये.
अशा लोकांना आम्ही विचारु इच्छितो की एवढीच स्त्रियांच्या कल्याणाची चिंता आपण वहात असाल तर मग वेदकाळात स्त्रिया वेदाध्ययन कशा काय करत होत्या? त्यांना गर्भ नव्हते का? त्यांना काय विशेष अधिकार प्राप्त होत्या का???
त्या स्त्रिया नि आजच्या कलियुगांतल्या स्त्रिया ह्यांत काय शरीरभेद आहे का??? असे कुठल्या ग्रंथात लिहिलंय की त्याकाळच्या स्त्रियांमध्ये व आजच्या कलियुगांतल्या स्त्रियांमध्ये शरीरभेद आहे म्हणून???
मंत्रांचे सामर्थ्य मीही जाणतो व अनुभवतो. ते नाकारायचा आमचा प्रश्नच नाही नि हेतुही नाही. पण म्हणून अकारण आपल्या स्वमतांधतेपोटी हा अप्पलपोटेपणा दर्शवणे शहाणपणाचे लक्षण आहे का???
मी स्पष्टवक्ता आहे, ज्यांना राग येतो त्यांनी माझे लेख वाचु नयेत. शाप दिलेत तरी चालतील. वेदांची सेवा ह्यापेक्षा श्रेष्ठ माझ्यादृष्टीने ह्या जगांत काहीच नाही. कुमारिल भट्टांच्या भाषेत
यदि वेदा: प्रमाणं स्यु: जीवेयम् !
वेदांचा अधिकार स्त्रियांलाच काय सर्व मानवजातीलाच आहे.
यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य: !
ब्रह्मराजन्याभ्यां शुद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय !
यजुर्वेद - २६.२
ह्या मंत्रांत वेदाधिकार सर्वांस सिद्ध आहे.
ज्याला साक्षात् ईश्वराची वाणी म्हणायची त्यांस केवळ कुणा विशिष्ट समुहांपूरते मर्यादित ठेवायचे हे किती शहाणपणाचे लक्षण? ह्यावरून आपण त्या परमात्म्यांसच दूषण लावतो आहेत हे का कळत नाही??? अर्थात आजकाल कुणीही कुणाला वेदाधिकार नाकारत नाही. काही अपवाद वगळता सर्वत्र सर्वांना वेदाधिकार आहे. हे अपवाद अर्थातच त्याज्य आहेत.
वेदोद्धारक महर्षि दयानंद सरस्वतींनी तर १५० वर्षांपूर्वीच अखिल मानवजातींस वेदाधिकार आहे हे वेदमंत्रांचे अनेकानेक स्पष्ट संदर्भ देऊन त्यांच्या अजरामर "सत्यार्थ प्रकाश" नामक ग्रंथात सिद्ध केलंय. तेंव्हापासून आर्य समाज अखिल मानवजातींस वेदाधिकार प्रदान करत आहे. तेंव्हा आजकाल ब्राह्मण लोक आम्हांला वेद शिकवित नाहीत असे बोंबलणार्यांनी कृपया इकडे लक्ष द्यावे. आर्य समाजच नव्हे तर इतरही अनेक ठिकाणी वेदाध्ययन सर्वांसाठी असलेले आम्ही स्वत: पाहुन आलोय. ज्यांना जिज्ञासा असेल त्यांनी शोध घ्यावा.
विस्तारभायस्तव इथेच स्त्रियांचा वेदाधिकार हा महत्वाचा विषय संपवून लेखणींस विराम देतो. पुढील लेखांत सविस्तर वैदिक स्त्रीदर्शन प्रत्येक वेदांनुसार घडविले जाईल. ज्यांना शंका असतील त्यांनी अवश्य विचाराव्यांत.
भवदीय,
©तुकाराम चिंचणीकर
पाखण्ड खण्डिणी
Pakhandkhandinee.blogspot.com

वैदिक स्त्री-दर्शन - लेखांक एक - वेदपरिचय



शारदीय नवरात्रोत्सवामित्त लेखमाला

वैदिक स्त्री-दर्शन - लेखांक एक - वेदपरिचय
यः पा॑वमा॒नीर॒ध्येत्यृषि॑भिः॒ संभृ॑तं॒ रसं॑ ।
सर्वं॒ स पू॒तम॑श्नाति स्वदि॒तं मा॑त॒रिश्व॑ना ॥
पा॒व॒मा॒नीर्यो अ॒ध्येत्यृषि॑भिः॒ संभृ॑तं॒ रसं॑ ।
तस्मै॒ सर॑स्वती दुहे क्षी॒रं स॒र्पिर्मधू॑द॒कं ॥
ऋग्वेद - ९.६७.३१-३२
जो परमेश्वरस्तुतीरुप ऋचांचे पठण करतो तो मंत्रद्रष्ट्याऋषींपासून स्पष्ट झालेल्या ब्रह्मरसास (ब्रह्मानंदांस) भोगतो आणि समग्र वायुंनी स्वादुकृत पवित्र पदार्थांचे भोग घेतो. त्यांस जणु सरस्वती किंवा ब्रह्मविद्या साक्षात् मातेसमान दुध, तुप, मध आणि नानाप्रकारच्या रसांचे दोहन करून ते प्राप्त करून देते !( हे वर्णन अलंकारिक आहे)
श्रुण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा: !
वेदभगवान सर्वांस अमृताचे पुत्र अशी उद्घोषणा करतो. व हाच वेद भगवान आम्हांस
ओ३म् इन्द्रं॒ वर्ध॑न्तो अ॒प्तुर॑: कृ॒ण्वन्तो॒ विश्व॒मार्य॑म् । अ॒प॒घ्नन्तो॒ अरा॑व्णः ॥
ऋग्वेद - ९.६३.५
म्हणजे सर्वविश्वांस आर्य अर्थात निरुक्तकारांनी म्हटल्याप्रमाणे "आर्य्य: ईश्वरपुत्र:" म्हणजेच ईश्वराचे किंवा अमृताचे पुत्र किंवा पुत्री व्हा अशी आज्ञा देतो. हाच ऋग्वेद आम्हांस
मनुर्भव अर्थात मनुष्य बन अशी आज्ञा देतो व हाच ऋग्वेद ह्याच वेदांमध्ये सर्वत्र एकांच परमात्म्याचे अर्थात त्या ईश्वराचे चिंतन आहे असे सांगताना
ओ३म् इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् । एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥
ऋग्वेद - १.१६४.४६
ईश्वर एकच आहे परंतु त्यांस विद्वांन अनेक नावांनी ओळखतात हीच आज्ञा देतो. अशा ह्या साक्षात् ईश्वरकृत वेदवाणीचा प्रथम परिचय देण्यासाठी हा आरंभी लेखनप्रपंच !
ह्या वैदिक स्त्री-दर्शन लेखमांलेस आम्ही नाव दिल्याप्रमाणेच वेदांमध्ये स्त्रीविषयी काय चिंतन आहे हेच स्पष्ट करणार आहोत. वेद ही संज्ञा आम्ही आमच्या आधीच्या अनेक लेखांत सांगितल्याप्रमाणे केवळ चार मंत्र संहिता अर्थात मंत्रभागांसाठीच आहे. वेदांचा अभ्यास करताना मूळ संहिता भाग, त्यावरचे भाष्य ग्रंथ असे ब्राह्मणग्रंथ, त्यांचाच अंतिम भाग असे उपनिषदे व आरण्यके असे चार साहित्य अभ्यासावी लागतात. त्यापैकी अनेक लोक चारींनाही वेद अशी संज्ञा देतात की जे पूर्णत: सैद्धांतिक दृष्ट्या चूक व अप्रमाण आहे. काही लोक ब्राह्मणग्रंथांनासुद्धा वेद ही संज्ञा देतात ज्यासाठी हे लोक कातंयायन ऋषींच्या "मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामध्येयम्" ह्या परिशिष्टांतला संदर्भ देऊन त्यांनाही वेद ही संज्ञा देतात की जे सर्वस्वी विरुद्ध व अप्रमाण आहे. येंविषयी सविस्तर भाष्य आम्ही कधीतरी करुच. पण तत्पूर्वी वेद ही संज्ञा केवळ नि केवळ चारी मंत्रसंहितांनाचा असून चार वेदांच्या संहिताभाग हाच तो केवळ अपौरुषेय अर्थात ईश्वरकृत भाग अर्थात वेद असून इतर सर्व ग्रंथ, म्हणजे सर्वच्या सर्व परवर्ती ग्रंथ हे ऋषिकृत किंवा मनुष्यकृत असल्याने ते सर्व जितके वेदानुकूल तितकेच ग्राह्य मानतो. पण ह्या लेखमालेंत केवळ चार संहिताभागांचाच विचार होणार असल्याने इतर ग्रंथांची चर्चा करण्याची आवश्यकता नसली तरी आरंभी नेमकी भूमिका प्रकट करणे आवश्यक असल्याने हा लेखनप्रपंच ! ह्या लेखमालेंत वादविवादासाठी आम्हांस रस नसल्याने ज्यांना वेदांविषयी आशंका आहेत त्यांना आमची भूमिका स्पष्ट व्हावी म्हणूनच हे लिहितोय. असो !
कोणताही ग्रंथ अपौरुषेय कसा काय असु शकतो, तो मानवकृत का असु शकत नाही, वगैरे वगैरे वादांसाठी स्वतंत्रपणे संवाद करता येईल. त्यासाठी आम्ही कधीही तयार असलो तरीही प्रस्तुत लेखमालेसाठी तो भाग तूर्तास आम्हांस संवादासाठी नको असल्याने ह्या विधेयांवर सांप्रत तरी वाद नको आहेत. स्वतंत्रपणे ही चिकीत्सा कधीही करता येईल ही विनंती.
तेंव्हा हा प्रथम लेख हा केवळ भूमिका मांडायसाठी लिहिला असून स्त्रीदर्शनाचे दिग्दर्शन व चिंतन पुढील लेखांपासून आरंभ होईल. नेमके किती लेख होतील ह्यांची आम्ही काही निश्चिती केलेली नसल्यामुळे जे काही सुचतंय त्यानुसार त्या ईश्वरेच्छेने लिहिण्याचा प्रयत्न ह्यांत करणार आहोत. आमच्या हातून अनुवादांस काही त्रुटी राहिल्यांस विद्वानांनी आमचा कान धरावा ही विनंती ! पण तेही केवळ प्रमाण देऊनच हेही न सांगणे लगे !
शेवटी जाताजाता हे सांगणे आवश्यक आहे हे सर्व लिहिण्यामागे आमची स्वत:ची काडीमात्र विद्वत्ता, बुद्धी किंवा व्यासंग वगैरे काहीही नसून जगद्गुरु तुकोबारायांच्या भाषेत
फोडिले भांडार, धन्याचा हा माल !
मी तों हमाल, भार वाहें !
हीच भूमिका राहणार आहे व शेवटपर्यंत राहीन. अनेक वेदवेत्त्या महर्षींपासून ते आत्ताच्या महर्षि दयानंद, महर्षि कात्यायन, भगवान पाणिनी, महर्षी पतंजली, सर्व वैदिक षड्दर्शनकार महर्षि, महर्षि सातवळेकर ह्या सर्वांच्या अभ्यासाने मला जे काही कळलं ते मांडायचा प्रयत्न करणार आहे. मी अल्पज्ञ व शुद्र व अज्ञानी आहे तरी ही सेवा गोड मानावी ही विनंती !
अलमतिविस्तरेण बुद्धिमद्वर्य्येषु !
भवदीय,
©तुकाराम चिंचणीकर
पाखण्ड खण्डिणी
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Wednesday, 19 July 2017

मूळ स्वभाव जाईना, त्याचा येळकोट राहिना ! जगद्गुरु तुकोबाराय



मार्क्सवादी, साम्यवादी, समाजवादी ह्यांचे एक ठरलेलं असतं. ह्यांचा इतिहासच आहे हा. ज्यांनी ज्यांनी त्यांच्यासाठी आयुष्य दिलं, त्यांची (कु)विचारसरणी व कार्य वाढविलं, त्यांच्याच पाठीत नंतर सुरा खुपसायचा. कसा? तर त्यांनी भविष्यात जर कधी हिंदु धर्म, वेद, गीता किंवा तत्सम कोणत्याही ग्रंथांची किंवा हिंदुधर्मपरंपरांची स्तुती केली किंवा तिचे आचरण केलं तर लगेचच त्यांस आंग्ल भाषेत डिसओन (disown) करायचं. म्हणजे त्यांची हकालपट्टी करायची. मग भले त्या मनुष्याने आयुष्यभर कितीही निष्ठेने ह्या विषवल्लीची सेवा केली का असेना.

खरंतर जगभरात ९.८ कोटी लोकांचे सरसकट अकारण हत्याकांड करणार्या मार्क्सवाद्यांकडून किंवा साम्यवाद्यांकडून आणखी काय अपेक्षा करायची म्हणा??? जिज्ञासूंनी "दि ब्लैक बुक ओफ कम्युनिझम" हा ग्रंथ वाचावा. आंतरजालावर (इंटरनेटवर) प्राप्त होईल.

एकीकडे आम्ही धर्म व ईश्वर नाकारतो म्हणणार्यांनी मार्क्सलाच देव बनविला. माझ्या आधीच्याच एका लेखांत म्हटल्याप्रमाणे मार्क्स हा मुळातच ईश्वरनिष्ठ व ख्रिस्तीपंथाचा प्रसारक होता. जिज्ञासूंनी त्याचा १८५७ वरचा ग्रंथ वाचावा.

मार्क्सचा प्रचंड भारतद्वेष व हिंदुधर्मद्वेष

१८५७चे स्वातंत्र्यसमर ब्रिटीशांना चिरडून टाकण्यासाठी प्रोत्साहित करणारा व भारतात पाववाल्या ख्रिस्ताचा प्रचार करण्यासाठी उद्युक्त करणारा मार्क्स ह्या लोकांचा आदर्श असतो ह्यातच सर्व काही आले.

मार्क्सवाद्यांनी, साम्यवाद्यांनी, समाजवाद्यांनी भारतातल्या महापुरुषांविषयी काय उद्गार काढले आहेत ते आपण पाहुयांत. त्यांनी महापुरुषांना घातलेल्या शिव्या

गांधींजीविषयी- a senile Old man

साम्यवादीच असलेल्या नेहरुंविषयी - a running dog of Imperialism

थोड्या समाजवादी असलेल्या सुभाष बाबूंविषयी - a traitor, a stooge, a goonda, a puppet, an agent of Hitler and Tojo, agent of Foreign Invaders etc.

समाजवादी जयप्रकाशजींविषयी - as above.

आश्चर्याची गोष्ट ही की उपरोक्त एकही हिंदुत्वनिष्ठ गटांतला नाही सावरकरांसारखा किंवा टिळकांसारखा. त्यांची तर गोष्टच नको.

ज्या नेहरुंनी आयुष्यभर मार्क्सवाद व साम्यवादाची पाठराखण केली त्यांनाच चीनच्या आक्रमणानंतरची साम्यवाद्यांनी केलेली शिवीगाळ जगजाहीर आहे. चीनशी हातमिळवणी करून मार्क्सवाद्यांनी केलेला देशद्रोह जगजाहीर आहे. त्या आक्रमणात जणु चीनचा काही दोषच नाही असे सर्व तत्कालीन मार्क्सवादी व साम्यवादी बोलत होते. आश्चर्य म्हणजे एका पाश्चिमात्य पत्रकारांस नेहरु ह्या आक्रमणानंतर काय बोलले होते हे वाचल्यावर नेहरुंची हतप्रभता लक्षात येते. आयुष्यभर गांधींना मानणारे नेहरु शेवटी त्यांस

गांधी - an awful old hypocrite

अशा शेलक्या विशेषणांत संभावना करतात ह्यातच त्यांना त्यांच्या जीवनाची इतिकर्तव्यता व हतप्रभता व अपराधीपण झाल्याचे दिसून येतं. स्वत:विषयी
You are meeting a failed Statesman

आता कॉ. डांगेंचे पाहुयांत.

डांगे हे भारतीय साम्यवादी पक्षाचे संस्थापक ! त्यांनी लिहिलेला
India - From Primitive Communism to Slavery
हा ग्रंथ मार्क्सवाद्यांना अगदी प्रमाण असतो. ग्रंथाची समीक्षा बाळशास्त्री हरदासांनी त्यांच्या "वेदांतील राष्ट्र दर्शन" ह्या पुण्यपत्तनीच्या व्याख्यानमालेत केली आहे. ग्रंथरुपाने तो द्विखंडात मामाराव दातेंनी प्रकाशितही केलाय. स्कैन्ड स्वरुपांत तो डिजिटल वर उपलब्ध ही आहे. प्रथम खंडात आहे समीक्षा.

इतिहासाचार्य  रावाड्यांच्या शेवटच्या अतिशय विकृत अशा " भारतीय विवाहसंस्थेचा इतिहास" ह्या ग्रंथाची प्रस्तावनाच त्यांची आहे. मुळात हा ग्रंथच अपूर्ण आहे. त्याची सविस्तर समीक्षा आम्ही योग्यवेळी करुच. पण आश्चर्य म्हणजे हिंदुद्वेष्टे लाल पावटे किंवा विद्रोही वगैरे सर्व लोक राजवाड्यांचाच हाच ग्रंथ नेहमी पुढे करतात. इतर साहित्य मात्र सोयीस्कर डोळेझाक. ब्राह्मणांनी खोटा इतिहास लिहिला म्हणून बोंबा मारायच्या पण सोयीस्कर राजवाडे उचलायचे. ह्यालाच आजच्या भाषेत पू-रोगामित्व म्हणतात. असो तर ह्याच डांग्यांची नवा काळच्या खाडिलकरांनीही एक आठवण सांगितलीय की त्यांचे लेखन वाचून पूर्वीचे भारतीय मार्क्सवादी पक्षाचे संस्थापक असे कॉ. श्रीपाद अमृत डांगे एकेदिवशी त्यांना बोलावून म्हणाले की तु फार छान लिहितोस. तुला आणखी एक सांगतो.

वैदिक षड्दर्शनांपैकी सांख्यदर्शनातच आजच्या आधुनिक अणुध्वमचे रहस्य आहे. वैदिक विज्ञान श्रेष्ठ आहे.
इति डांगे खाडिलकरांना उद्देश्युन

आणखीही असे काही प्रसंग घडल्यावर लगेचच लाल पावट्यांनी त्यांना बहिष्कृत केलं...कारण त्यांनी सगळ्यांच्या बाबतीत हेच केलंय व करतात व करतही राहतील.
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प्रा. नरहर कुरुंदकर

आचार्य म्हणण्याइतके ते योग्यतेचे वाटत नाहीत. कारणमीमांसा कधीतरी स्पष्ट करेन. पण आयुष्यभर स्वत:ला मार्क्सवादी म्हणविणारे कुरुंदकर ह्याच द्वेषाला बळी पडले. पुढे कुरुंदकरांना पण तेच भोगावं लागलं. मुलाची सोवळ्यात मुंज लावल्याने त्या लाल पावट्यांनी त्यांनाही नेहमीप्रमाणे झिडकारलं.

जे आधी स्वत: साम्यवादी होते त्यांनाही त्यांनी तेच केलंय. डांग्यांच्या बाबतीतही तेच. नेहरुंच्याही तेच. कुरुंदकरांच्याही तेच

सीता राम गोयलांनी म्हणूनच "नेताजी अँड द सीपी आय" नावाने ग्रंथ लिहिलाय. त्यात सुभाषबाबूंना साम्यवाद्यांनी किती यथेच्छ शिव्या दिल्यात ते लिहिलंय.

पाकिस्तानच्या मदतीला सुईणीसारखे धाऊन जाणारे हे लाल पावटे. म्हणूनच एक साम्यवादी असणारे पण नंतर त्यांस वैतागलेले ख्वाजा अहमद अब्बास त्यांच्या आत्मचरित्रात म्हणतात

Who killed India? India was killed by the Communist Party of India which provided the Muslim separatists with an ideological basis for Irrational and Anti- national demand for Pakistan. Phrases like homeland,  nationalities, self-determination., etc were  all the ammunitions supplied by the Communists to the legion of Pakistan.

Page no. 281 - I am not an Island - An Experiment in autobiography by Khwaja Ahmed Abbas
1977 - New Delhi
संदर्भ - Gandhi's Assassination - Prof. Makkhan Lal - India First Foundation, New Delhi

मार्क्सवाद्यांचा पाकिस्तानच्या निर्मितीला असलेला पाठिंबा तर जगजाहीर आहे.

आता समाजवाद्यांचे पाहुयांत



गांधीवाद मार्क्सवादाची सांगड घालणार्या सत्याग्रही समाजवादाचे मूल लेखक व प्रवर्तक हे शंदा जावडेकर पण त्यांचे पुरस्कर्ते आचार्य(???) भागवतांचे समग्र साहित्य महाराष्ट्र राज्य साहित्य नि सांस्कृतिक महामंडळाने प्रकाशित केलंय तीन खंडात. संकेतस्थळांवर उपलब्ध आहे. ते गांधींचे नि:स्सीम भक्त. एकीकडे समाजवादाच्या गप्पा ठोकणारे हे लोक सर्व हिंदुंच्या सहभोजनांना मात्र विरोध करायचे. ब्राह्मणांच्या पंगती वेगळ्या असाव्यांत ह्या विचाराचे ते आग्रही होते. गांधीजींनी साबरमती आश्रमाची नियमावली करताना तर सहभोजन करुच नये अशी आरंभी स्पष्टपणे आश्रमात नियमावली ठेवली होती. ते म्हणतात

"हा आश्रम वर्णाश्रम धर्मपूर्ण मानणारा आहे. जातीभेदामुळे नुकसान झालेले नाही, उलट फायदाच पुष्कळ झालेला आहे. एकत्र बसून जेवल्याने मातृभाव यत्किंचितही वाढत नसतो. भोजनही दुस-या अनेक दैनिक व्यवहारांप्रमाणेच, एकांतातच झाले पाहिजे."

संदर्भ - अवंतिकबाई गोखले लिखित " महात्मा गांधी" मुंबई, १९१८ - पृष्ठ क्रमांक ९२

 शं दा जावडेकर हे त्यांच्या एका ग्रंथात "गांधी व टिळक" मध्ये सावरकरांवर यथेच्छ तोंडसुख घेताना टिळकांची स्तुती करताना त्यांचे तथाकथित मुस्लीमप्रेम दर्शविण्याचा अट्टाहास दाखवितात. टिळकांचा लखनऊ करार व त्यांचे

"उद्या ब्रिटीश गेल्यावर येणारे मुस्लिमांचे राज्य हे मी १००% स्वदेशी मानतो."

हे टिळकांच्या कुठल्यातरी एका भाषणांच्या खंडातले वाक्य उद्धृत करून टिळकांची स्तुती करताना सावरकरांना त्यांच्या हिंदुत्वनिष्ठेसाठी शिव्यांची लाखोली वाहतात.

ह्याला म्हणतात समाजवाद ! आणखी काय लिहावं ? राम मनोहर लोहियांचे उदाहरण ही बोलकं आहे. (संदर्भ - ज्ञानयुक्त क्रांतियोद्धा - ज द जोगळेकर)

दुर्दैव हे की हे सर्व दिसत असूनही हे लोक साम्यवाद, समाजवाद, मार्क्सवादाकडे का वळतात हे कळत नाही. थोडक्यात काय तर थोडं आपल्याविरोधात गेलं की लगेचच त्यांस बहिष्कृत करायचं. तरीही लोक साम्यवाद, समाजवादाच्या नादी कसे काय लागतात कुणास ठाऊक ???

गोडगोड शब्द बोलायचे, समता, स्वातंत्र्य, न्याय, वगैरे गप्पा हाणायच्या, पण वास्तवात मात्र विरोधात गोले की लगेचच बहिष्कृत करायचं. शोषण, शोषित, शोषक, वगैरे मार्क्सवादी विचारसरणीच्या तथाकथित क्लास स्ट्रगल अर्थात तथाकथित वर्गसंघर्षाच्या खोट्याच कथा तरुणांच्या माथी मारायच्या व माथी भडकवायची.

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी म्हणूनच मार्क्सवाद्यांची केलेली निर्भ्रर्त्सना जगजाहीर आहे. अर्थात दुर्दैवाने आता बाबासाहेबांनाच मार्क्सवादी ठरविण्याचा अट्टाहास सुरु आहे ही गोष्ट लपून राहिलेली नाही. कम्युनिस्टांपासून सावध राहा असे टाहो फोडून बाबासाहेब समाजबांधवांस समजावून सांगत असताना त्यांनाच त्याच (कु)विचारसरणीत गोंदविण्याचा प्रयत्न किती निंदनीय आहे हे वेगळं सांगायला नकोच. सविस्तर ह्यावर कधीतरी लिहीनच. तूर्तास लेखणींस विराम !

अलमतिविस्तरेण बुद्धिमद्वर्य्येषु !

©तुकाराम चिंचणीकर
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